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जनसंख्‍या नियंत्रण: जानिए किन राज्‍यों में है कानून और क्‍या है सुप्रीम कोर्ट की राय?

नई दिल्‍ली. उत्तर प्रदेश (UP) राज्य विधि आयोग की ओर से दो बच्‍चों की नीति (Two Child Policy) लागू करने के लिए जनसंख्या नियंत्रण (Population Control) का जो मसौदा विधेयक तैयार किया जा रहा है, उसे लेकर देश में बहस छिड़ गई है. कुछ लोगों ने मसौदे के समय को लेकर सवाल उठाए हैं, क्‍योंकि राज्‍य में आठ महीने में चुनाव होने हैं तो कुछ ने इस नीति को जल्‍द से जल्‍द लागू करने की वकालत की है.

जनसंख्‍या नियंत्रण की नीति पर लोगों की राय में फर्क साफ दिखाई देता है. बहुत से लोग नीति को अनावश्‍यक, महिलाओं के अधिकारों का हनन और मुसलमानों के साथ कथित रूप से भेदभाव मानते हैं. यूपी में लागू किए जाने वाले इस कानून पर राजनीति से लेकर कानून तक में विभिन्‍न मापदंडों पर फैसला होने की संभावना है. हालांकि मसौदा विधेयक ने भारत में जनसंख्‍या नियंत्रण कानून की आवश्‍यकता पर एक बहस जरूर छेड़ दी है.

जनसंख्या नियंत्रण पर यूपी विधि आयोग का मसौदा विधेयक क्या कहता है?

अगर यह एक्ट लागू हुआ तो दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर सरकारी नौकरियों में आवेदन और प्रमोशन का मौका नहीं मिलेगा. 77 सरकारी योजनाओं व अनुदान से भी वंचित रखने का प्रावधान है. मसौदा विधेयक के लिए जनता से 19 जुलाई तक सुझाव आमंत्रित किए गए थे. इसमें उन लोगों को भी प्रतिबंधित करने का प्रस्‍ताव है, जिनके पहले से दो से अधिक बच्‍चे हैं. इसके साथ ही दो से कम बच्‍चे वालों को कर में छूट जैसे प्रोत्‍साहन का भी सुझाव दिया गया है.

ड्राफ्ट में एक बच्चे वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रस्तावित प्रोत्साहनों में आवास योजनाओं में लाभ, वेतन वृद्धि, पदोन्नति को शामिल किया गया हैं. इसी तरह गैर-सरकारी कर्मचारियों के लिए पानी, आवास और गृह ऋण के करों में छूट की बात कही गई है. यदि किसी एकल बच्चे के माता-पिता पुरुष नसबंदी का विकल्प चुनते हैं, तो बच्चे को 20 साल तक मुफ्त इलाज, शिक्षा, बीमा शिक्षण संस्था और सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देने की सिफारिश है.

आयोग जनता से सुझाव मिलने के बाद मसौदा विधेयक को अंतिम रूप देगा और अपनी सिफारिशों के साथ इसे योगी आदित्यनाथ सरकार को सौंपेगा. राज्य सरकार आयोग की सिफारिशों पर आगे की रणनीति बनाकर कदम उठाएगी.

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इन राज्यों में पहले से दो बच्‍चों की नीति लागू है

राजस्थान : राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 के अनुसार सरकारी नौकरी के मामले में जिन उम्‍मीदवारों के दो या दो से अधिक बच्‍चे हैं, उन्‍हें नियुक्ति का पात्र नहीं माना जाता है. इसके साथ ही यदि किसी शख्स के दो से अधिक बच्चे हैं तो उसे ग्राम पंचायत या वार्ड सदस्य के रूप में चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य घोषित किया जाएगा. बता दें पिछली सरकार ने विकलांग बच्‍चों के मामले में दो बच्‍चों की नीति में ढील दी है.

मध्य प्रदेश : मध्‍य प्रदेश साल 2001 से ही दो बच्‍चों की नीति का पालन कर रहा है. मध्य प्रदेश सिविल सेवा (सेवाओं की सामान्य स्थिति) नियमों के अनुसार, 26 जनवरी, 2001 को या उसके बाद दो से अधिक बच्‍चे होने पर वह शख्‍स किसी भी सरकारी सेवा हेतु अयोग्य माना जाएगा. बता दें कि यह नियम उच्चतर न्यायिक सेवाओं पर भी लागू होता है. राज्‍य में साल 2005 तक स्‍थानीय निकाय चुनावों में भी इस नियम को लागू किया गया था, लेकिन बाद में आपत्ति होने पर इसे बंद कर दिया गया.

महाराष्ट्र : महाराष्ट्र सिविल सेवा (छोटे परिवार की घोषणा) निगम, 2005 के अनुसार, दो से अधिक बच्चों वाले शख्स को राज्य सरकार के किसी भी पद हेतु अयोग्य घोषित किया गया है. इसके साथ ही महाराष्ट्र जिला परिषद और पंचायत समिति अधिनियम स्थानीय निगम चुनाव (ग्राम पंचायत से लेकर नगर निगम तक) लड़ने के लिए दो से अधिक बच्चों वाले शख्स को अयोग्य घोषित किया जाएगा.

गुजरात : साल 2005 में सरकार द्वारा गुजरात स्थानीय प्राधिकरण अधिनियम में संशोधन किया गया था. इस बदलाव के बाद दो से अधिक बच्‍चे वाले उम्‍मीदवार को पंचायत, नगर पालिकाओं और नगर निगम के निकायों का चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया है.

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भारत की शीर्ष अदालत की क्‍या है राय

1976 में किए गए संविधान के 42वें संशोधन में जनसंख्या नियंत्रण पर कानून बनाने का अधिकार सरकार को दिया गया था. केंद्र या राज्य सरकार, दोनों इस पर कानून बना सकते हैं. लेकिन कोई भी ऐसा नहीं करता है. देश में एक राष्ट्रीय नीति नहीं है, जो किसी जोड़े के लिए बच्चों की संख्या को सीमित कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट को अभी तक ऐसी नीति की जांच करने का मौका नहीं मिला है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में ऐसी तमाम याचिकाएं डाली जा चुकी हैं, जिसमें कोर्ट से मांग की गई है कि वह केंद्र सरकार को दो-बच्चों की नीति लागू करने का आदेश दे.

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